ओशो दी ग्रेट
- ayubkhantonk
- Feb 25
- 5 min read
Updated: 2 days ago
ओशो रजनीश आज तक हुए रहस्यदर्शियो में अनूठे हैं l उन्होंने मुख्य रूप से तनाव ग्रस्त व्यक्तियों को ध्यान और मौन का स्वाद चखाकर यह एहसास कराया कि इस तनाव का सृजन मनुष्य स्वयं करता है l मेरा सौभाग्य है कि मैं ओशो जैसी महान चेतना के समकालीन रहा l जीवन के प्रत्येक रहस्य को ओशो ने अपने अमृत प्रवचनों से पूर्ण रूपेण खोल कर रख दिया है l इतिहास के संत पुरुषों और सूफियों के गूढ़ सूत्रों की व्याख्याएँ प्रासंगिक और नूतन प्रतीत होती है l शायद ही ऐसे संत और मनीषी हो, जिन पर ओशो के प्रवचन न हो l

ओशो किसी परम्परा संप्रदाय की कड़ी नहीं है बल्कि ओशो तो सत्य को अभिव्यक्त करने वाले प्रथम पुरुष हैं l जैसा सत्य उन्होंने अनुभव किया उसे वैसे का वैसा अभिव्यक्त कर दिया l
“हम कौन हैं ” इसे समझने की दिशा में और ओशो ने जो अद्वितीय योगदान दिया है उसे किसी श्रेणी में नहीं बांधा जा सकता l वे एक रहस्यवादी, अन्तर - जगत के वैज्ञानिक और विद्रोही चेतना है l उनकी रुचि इस बात में रही कि मानवता को तत्काल एक नई जीवन शैली खोज निकालने की आवश्यकता के प्रति कैसे सजग किया जाए l
ओशो की अमृतवाणी सुनने का सौभाग्य वर्ष 1983 में प्राप्त हुआ l उस समय मैंने कॉलेज में प्रवेश लिया ही था l उस समय ओशो को “भगवान रजनीश ” के नाम से जाना जाता था l तब वे अपने दस हज़ार सन्यासियो के साथ अमेरिका के “ रजनीशपुरम ” में निवास कर रहे थे l उस जमाने में भगवान रजनीश के स्पीच (प्रवचन) टेप रिकॉर्डर की रील वाली कैसेट में किसी-किसी ओशो प्रेमी के पास उपलब्ध थे l एक विद्यार्थी महंगी कैसेट खरीदने में सक्षम नहीं था इसलिए एक कैसेट 50 पैसे प्रतिदिन के हिसाब से किराए पर लेना और उसी दिन में दो बार टेप रिकॉर्डर में सुनकर वापस जमा कराना ही मुफीद था l पहले कैसेट का शीर्षक था “ अनहद में विश्राम ” | सबसे पहले तो शीर्षक ही कोतुहल पैदा करने के लिए काफी था l कैसे कोई व्यक्ति अनहद में विश्राम कर सकता है? आखिर ‘ अनहद ’ होता क्या है ?
एक जिज्ञासा पैदा हुई|
एक कॉलेज विद्यार्थी का कोतुहल जागृत हुआ कि विश्राम की नई पद्धति सीखते हैं l वैसे तो चार दशक बीत गए मगर ओशो की सम्मोहित करने वाली वाणी आज भी मस्तिष्क में घूमती है l ओशो कह रहे थे -
“ एक ही बात याद रखो कि परमात्मा के सिवाय ना तो हमारी कोई माता है ना ही हमारा कोई पिता है l ब्रह्म के सिवाय हमारी कोई जाति नहीं है l ऐसा बोध हो जाए तो जीवन में क्रांति हो जाती है l फिर तुम्हारे जीवन में पहली बार धर्म का सूर्य उदय होता है l तब तुम्हें पता लगेगा कि हमारा घर शून्य में है l असली घर जिसे बुद्ध ने निर्वाण कहा है, उसी को दरिया [संत] शून्य कह रहे हैं l परम शून्य में, परम शांति में, जहां लहर भी नहीं उठती, ऐसे शांत सागर में, जहां विचार की कोई तरंग नहीं, वासना की कोई उमंग नहीं, जहां विचार का कोई उपद्रव नहीं, जहां शून्य का संगीत बजता है, जहां अनाहद नाद गूंज रहा है - वही हमारा घर है l ”
बिसराम [ विश्राम ] को समझाते हुए यह भी कहा था –
“ और जिसने उस शून्य को पा लिया, उसने ही विश्राम पा लिया l ऐसा विश्राम जिसकी कोई हद नहीं है, जिसकी कोई सीमा नहीं है | ”
कुछ वर्षों बाद मुझे पुस्तकालय में " अनहद में बिसराम " मिल गई l मैं कई दिनों से सोच रहा था कि उस कैसेट में मात्र 90 मिनट का एक प्रवचन था– अगर बिसराम [ विश्राम ] की पूरी थ्योरी मिल जाए तो अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर मिल जाए l ओशो ने कई बार कहा है कि हम बार-बार जिस विषय पर सोचते रहते हैं l अस्तित्व उसे घटित कर देता है l मुझे यह पुस्तक मिली l तब तक मैं बालिग हो चुका था|
इस पुस्तक में ओशो ने कहा था-
“ मैं अपने सन्यासी को न तो ईसाई मानता हूँ , न हिंदू, न मुसलमान, न जैन, न बौद्ध l मेरा सन्यासी तो सिर्फ शून्य की खोज कर रहा है l सारी दीवारें गिरा रहा है l मेरा सन्यासी तो अनहद की तलाश में लगा है, सीमाओं का अतिक्रमण कर रहा है l घर छोड़ना नहीं है l घर में रहते ही जानना है कि घर मेरी सीमा नहीं है l परिवार छोड़ना नहीं है l परिवार में रहते हुए जानना है कि परिवार मेरी सीमा नहीं है l इस बोध को ध्यान कहो, जागरण कहो, विवेक कहो, जो भी शब्द तुम्हें प्रीतिकर लगे, वह कहो l शून्य में पहुंचने पर ही तुम्हें विश्राम मिलेगा l वरना जीवन एक संताप है, पीड़ा है, दुख है l बिना शून्य में प्रवेश करें - हमारी जडे सुखी जा रही हैं, पौधे झुलस रहे हैं l जैसे ही किसी ने शून्य में अपनी जड़े जमा ली तभी हरियाली छा जाती है, फूल उग आते हैं, बसंत आ जाता है l जीवन में बहार आ जाती हैं l भंवरे गीत गाने लगते हैं और मधुमक्खियां गुंजार करने लगती हैं l तब जानना की जीवन कृतार्थ हुआ l ”
तब मुझे पता लगा कि हमारा जीवन निरस और आभाविहीन क्यों नहीं है? हमारे दिमाग में क्यों चौबीस घंटे विचारों का झंझावात चलता रहता है | ऐसे लोग भी मिलते थे जिनके पास पद था, प्रतिष्ठा थी, धन था, यश था फिर भी बेचैन और परेशान क्यों है? परमात्मा के इस खूबसूरत और आनंददायक जगत में स्वयं को समायोजित नहीं कर पा रहे हैं|
चार दशकों की ओशोमय जीवन शैली से जिस आनंद की अनुभूतिया हुई, उसे इस वेबसाइट के माध्यम से मित्रों के संग बांटना ही इस वेबसाइट आरंभ करने का पवित्र उद्देश्य है l

सदगुरु ओशो ने परमात्मा की प्राप्ति और आनंदपूर्ण जीवन के लिए कई ध्यान प्रयोग इजाद किए हैं l इन ध्यान प्रयोगो को सरल भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे l ओशो जिन लोगों के साथ बोल रहे थे वे उस समय के अति शिक्षित और परिष्कृत लोग थे l ओशो की भाषा उन्हीं लोगों के अनुरूप कलिष्ठ रही है l ओशो की देशना का मूल आधार प्रेम, ध्यान और आनंद है l
इस वेबसाइट के माध्यम से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया जाएगा कि क्यों आम लोग ओशो के विरोध में खड़े हो गए थे l ओशो ने प्रवचनों के माध्यम से अपने अनुभव साझा किये जो रिकॉर्ड किया जाकर लगभग 650 पुस्तकों के रूप में प्रकाशित हुए है जो एक विश्व कीर्तिमान के साथ-साथ एक चमत्कार है l हम प्रयास करेंगे की सरल और बोलचाल की भाषा में ओशो की देशना को डिजिटल क्रांति के इस युग में प्रत्येक व्यक्ति तक पहुचाये ताकि उनका जीवन भी उत्साह और आनंद से भर जाए l
सामान्यजनों ने मुझे यह भी कहा कि ओशो के व्यकतव्य विरोधाभासी हैं l मुझे नहीं लगता कि ओशो के व्यकतव्य विरोधाभासी हैं l ओशो ने ध्यान, प्रेम, योग, भक्ति पर अपने अनुभव शेयर किए हैं इसलिए उनके प्रवचनों को सरसरी दृष्टि से पढ़ने या सुनने पर उनके व्यकतव्य विरोधाभाषी प्रतीत होते हैं लेकिन गहराई से विचार करने पर वह विरोधाभाषी नहीं लगेंगे l
यह वेबसाइट ओशो को समझने और आनंदपूर्ण जीवन जी ने की दिशा में एक प्रयास भर है|
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