आनंदपूर्ण जीवन रूपांतरण की कीमिया
- Ayub Khan
- Mar 11
- 36 min read
Updated: 2 days ago
लोग सोचते है कि ओशाे समाज और धर्म विरोधी थे। लेकिन यह सत्य नही है। ओशो सम्प्रदाओ और तथाकथित धर्मो में उत्पन्न हुए अंधविश्वासो और पांखडो के विरोधी थे। ओशो का उद्वेश्य, समाज मे निहित स्वार्थो की पूर्ति के लिए जो मानसिक विकृतचित्ता पैदा हुई है उसे उजागर करना और उसके समाधान प्रस्तुत करना रहा है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ओशो ने धर्मो का पुरजोर विरोध किया है लेकिन धार्मिकता की प्रशंसा की है। बरसो पहले, उनके सार्थी प्रोफेसर के पुत्र ने ओशो से यही प्रश्न पूछा था कि वे धर्मो के खिलाफ क्यो बोलते है, तब उन्होने यही कहा था कि धर्म तो एक वचन है। तुम्हारे समाज ने उसे बहुवचन बना दिया है। उन्होने कहा कि वे सदैव धर्म के पक्ष में है। उनका उद्वेश्य व्यक्ति को धार्मिक बनाना है। जेसे ही व्यक्ति धार्मिक होता है, वैसे ही उसके जीवन से महत्वकाक्षा और अंहकार के बादल स्वतः छंट जाते है। इसके बाद ही व्यक्ति निर्मल और शांत चित्त हो सकता है।
ओशो के कतिकारी प्रवचनो से जिन तथाकथित धार्मिक लोगो की रोजी रोटी प्रभावित हो रही थी वे तर्को के माध्यम से मुकाबला करने मेे समर्थ नही थे इसलिए उन्होने आरोप लगाना प्रारंभ कर दिया कि ओशो उनके देवी देवताओ का अपमान कर रहे है। यह वे लोग थे, जिनके जीवन से उत्साह गघे के सींग की तरह गायब हो गया था। लोगो के चेहरे आभाविहिन होकर मुरझा गये थे। वे सही गलत में भेद करना भूल गए थे। उनका जीवन लकीर के फकीर की तरह हो गया था। जीवन, रचनात्मकता और मौलिकता से शून्य हो गया था। तथाकथित जानकारो ने लोगो के दिमाग में बैठा दिया था कि तुम्हारा, वर्तमान पूर्व जन्मो के कृत्यो का फल है। इस सूत्र को घुटटी की तरह लोगो को पिलाकर उनसे विकास के पूरे अवसर छीन लिए गए। समाज में धारणा फेल गई कि जब वर्तमान जीवन के कष्ट, पूर्व जन्म के कृत्यो का ही फल है तो हम कर भी क्या सकते है। वे जस के तस होकर बैठ गए। जीवन के रुपांतरण के मार्ग पर ऐसा अवरोघ पैदा कर दिया गया कि कोई इन अवरोघको को पार नही कर सके।
लोगो को पूर्व जन्म के संस्कारो के जाल में इस तरह उलझा दिया गया कि वे यह सोचकर संतुष्ट हो जाए कि जब पूर्व जन्म के संस्कारो से ही हमारा वर्तमान निर्मित हुआ है तो हम कुछ नही कर सकते। आज हमारे जीवन में दुःख ने पॉव पसार रखे है तो दुखो को अलविदा कहने का हमारे पास कोई चारा नही है। हमें यह दुःख तो भोगने ही होगें। जब इस प्रकार की अवघारणा से कोई समाज ग्रस्त हो जाए तो समझ लीजिए कि इस कृत्रिम दुःख जाल से कैसे बाहर निकला जा सकता है। इस दुःख के कारागृह से बाहर निकलने का उपाय सोचने समझने की शक्ति छीन ली गई। जब आशो ने लोगो को जागृत करना शुरु किया तो ऐसी अवधारणा के प्रतिपादक तिललिाने लगे। उन्होने आशो को बदनाम करने के उपाय खोजने शुरु कर दिए। सबसे पहले तो उन्हे नास्तिक घोषित किया गया। समाचार पत्रो मे उनके बारे में लिखा जाने लगा कि वे घर्म विरोधी है। वे लोगो को शास्त्रो के विरुद्व आचरण करने हेतु दुष्प्रेरित कर रहे है। मुझे याद है, जब मैने ओशो को पढना शुरु किया था, तब मोहल्ले के लोगो ने मेरा अघोषित बहिष्कार सा कर दिया था। जैसे ही मुझे ओशो की पुस्तक पढते देखते तो बुरा सा मुॅह बनाकर हिकारत की दृष्टि से देखते ताकि मेरे में अपराघ बोघ जागृत हो और मै ओशो को पढना छोड दूॅ। धीरे-घीरे मेरा विवेक जागृत होने लगा। मै प्रत्येक कार्य आरंभ करने से पूर्व उसकी औचित्यता और तार्किता पर विचार करने लगा। ‘‘क्यो और कैसे‘‘ जैसे शब्द, हर वक्त मेरे दिलो दिमाग मे छाए रहते। मै पत्रिकाओं में कोई कहानी भी पढता तो सबसे पहले कहानीकार की मानसिकता का विश्लेषण करने लग जाता । फिर उस कहानी के अंत को लेकर विचार करता कि क्या कहानी का इस. तरह अंत करना औचित्यपूर्ण था, क्या इसमे एक घटना और जोडी जा सकती है, यदि मुझे लगता कि एक और घटना का समावेश करने से कहानी की रोचकता में वृद्वि हो सकती है तो मैं अपनी नोटबुक में कहानी का विस्तार करके एक घटना और जोड देता। चुनिंदा मित्रो को, जोडे गए कथानक को सुनाता तो वे पहला प्रश्न यही पूछते कि मै प्रत्येक चीज में अपनी टॉग क्यो अडाता हूॅ।
वे यह तो मानते थे कि मै कहानियो को मात्र मनोरजन के लिए नही पढता हूॅ बल्कि कहानियो को गंभीरतापूर्वक पढकर अपने विवेक का भी प्रयोग करता हूॅ। कभी-कभी तो मै अध्यापको को भी पाठयपुस्तको की कहानियों में कथानक जोड कर बताता तो वे आनंदित होते और कक्षा में नए कथानक का मुझसे वाचन भी कराते। कई शिक्षको को पसंद नही आता और वे मेरे द्वारा जोडे गए कथानक की खिल्ली भी उडाते थे।
कहानियो के प्रति विवेक को जागृत करने का श्रेय ओशो को ही जाता है। ओशो की पुस्तक में मैने एक कहानी पढी और कहानियों में जोडने घटाने की प्रवृति विकसित हुई। वैसे तो पूरा जीवन ही ओशो के विचारो से प्रभावित हुआ है। मुर्छा के घने बादलो में से होश की कुछ किरणे दृष्टिगत होने लगी। रचनात्मकता की वीणा से कुछ सुर सुनाई देने लगे। जीवन को अपने ढंग से जीने का बीज अंकुरित होने लगा। सामाजिक परिवेश से जो अपुष्ट श्रृद्वा का पाठ पढा था, वो अब संदेह के घेरे में आने लगा। यह अनुभव में आया कि हमारे आस-पास जो घटित हो रहा है। वह नैसर्गिक नही है। हमने प्रकृति के साथ इतनी छेडछाड करी है कि प्रकृति का मूल स्वरुप ही नष्ट हो गया है। क्या सदियो से स्कूलो के पाठयक्रम मे चल रही कहानी अधूरी हो सकती है। इसका आभास भी ओशो की वजह से हुआ। स्मृति के आधार पर पाठयपुस्तक की वह कहानी लिख रहा हूॅ। विचार करे कि पहली बार ओशो की प्रज्ञा से वह कहानी अपने वास्तविक अंत को प्राप्त हुई। मैंने तीन दशक पहले इसे एक प्रवचन में सुना था। ओशो कह रहे थे कि बंदरो के बारे में प्रचलित है कि वे नकलची होते है। यदि मानव उन्हे डराने की कोशिश करता है तो वे अपने दॉत भींचकर आक्रामक मुद्रा बनाकर हिंसक नजर आने लगते हैं। कोई प्रेम से उनकी तरफ कैला उछालता है तो वे विकिटकीपर की भांति उसे लपक लेते है। उस समय उनकी मुद्रा धन्यवाद की होती हैं। जब वे प्रेमालाप कर रहे हो तब उन्हे डिस्टर्ब किया जाए तो उनकी मुख मुद्रा अलग प्रकार की हो जाती है।
एक टोपिया बेचने वाला था। गॉव-गॉव, ढॉणी-ढाणी, मे फेरी लगाकर अपनी टोपिया बेचा करता था। यह उसका खानदानी व्यवसाय था। उसकी चार पीढियॉ यही कार्य करती रही थी। टोपियॉ सिलने का कार्य महिलाए करती थी और बेचने का कार्य परिवार के पुरुष करते थे। टोपिया बेचने से जो आमदनी होती थी, उससे परिवार की आजीविका चलती थी।
एक दिन वह समीप के गॉव में टोपियॉ बेचने गया हुआ था। टोपियों का गटठर उसके सिर पर था। गर्मियो के दिन थे। दोपहर हो चली थी। काफी थक गया था। फिर उसे नीम का छायादार वृक्ष नजर आया। वह वृक्ष के नीचे पहुचाॅ तो उसे कुछ शीतलता महसूस हुई। उसने टोपियों का गटठर जमीन पर रखा। बोतल से पानी पिया और बोरी बिछााकर लेट गया। गर्मियो में सूरज आग उगल रहा था। बीस किलोमीटर का सफर कर चुका था। थकान के कारण नींद की परिया उस पर जादू डालने लगी। वह नींद के आगोश में चला गया। बहुत गहरी नींद आई। करीब दो घंटे की गहरी नींद लेकर वह जागा तो उसे टोपियों का गटठर नजर नही आया। उसके चेहरे पर चिंता की लकीरे साफ नजर आने लगी। उसने दूर दूर तक नजर दौडाई लेकिन टोपियों का गटठर कहीं नजर नहीं आया। उसका गला सूख गया। वह बैचेन हो गया। उसने नीम के पेड की शाखाओ पर देखा तो पूरा माजरा समझ में आ गया। पेड पर बंदरो की बारात रुकी हुई थी। लगभग साठ-सत्तर की तादाद में होगें। प्रत्येक वानर के सिर पर टोपी थी। वे टोपी सहित एक शाखा से दूसरी शाखा पर उछल कूद कर रहे थे। उसने बंदरो को इतना खुश कभी नही देखा था। उसने कई बार सडक के किनारे बैठे बंदरो को कैले खिलाए थे। कैला खाते वक्त भी बंदर इतने खुश नही हुए थे। टोपी उनका खादय पदार्थ भी नही थी। फिर भी वे बहुत खुश थे।
उसके चेहरे से चिंता की लकीरे मिटने लगी। उन लकीरों का स्थान लिया एक मुस्कान ने। वह मुस्कुराया। उसने अपने पूर्वजो से सुना था कि बंदर नकलची होते है। वे आदमी की नकल करते है। उसके सिर पर भी एक टोपी थी। यह मानते हुए कि जैसा एक्शन, मै करुगॉ वैसा ही एक्शन नीम पर बैठी बंदरो की बारात करेगी, उसने अपने सिर से टोपी उतारी और बंदरो की तरफ उछाल दी। बंदरो ने भी वैसा ही किया। उन्हाने भी अपनी टोपिया,टोपी वाले की तरफ उछाल दी। बंदरो की टोपिया जमीन पर गिर गई। टोपी विक्रेता खुशी से झूम उठा। उसने जमीन पर गिरी, टोपियों को इकटठा किया और अपनी गठरी में बॉध लिया। उसने एक नजर नकलची बंदरो पर डाली। फिर टोपियों से भरी गठरी को सिर पर रखकर अपने घर के लिए रवाना हो गया। बंदर मुॅह ताकते रह गये। उसने अपनी बुद्वि का लोहा मनवाने वाले अंदाज में धीमे से कहा ‘‘बेचारे बंदर‘‘।
पाठयपुस्तको में यही पर कहानी का अंत हो जाता है। ओशो कहते है कि यह कहानी अधूरी है। ओशो इस अधूरी कहानी को इस तरह पूरी करते है-
टोपी विक्रता देर शाम तक अपने घर पहुॅचा। उसकी उम्र साठ वर्ष पार कर गई थी। उसने सॉझ का भोजन करते हुए अपने बडे पुत्र सहित आज घटित हुई घटना का वृतांत अपने परिवारजनो को सुनाया और अपनी बुद्वि की खुद ही तारीफ करते हुए खुलासा किया कि किस तरह उसने बंदरो से टोपियो को पुनः हासिल किया। परिवारजन भी उसकी बुद्वि की तारीफो के पुल बॉधने लगे। फिर उसने गंभीर होकर अपने बडे पुत्र से कहा कि मै अब बुढा हो गया हूॅ। मेरे से अब गॉव-गॉव,ढाणी-ढाणी टोपियों का गटठर लेकर घूमने की ताकत नही बची है। मै. अब थक कर चूर हो जाता हॅू। अब तुम बडे हो गए हो इस खानदानी काम को चालू रखने का भार तुम्हारे कंघो पर हैं। मेरे कंघे अब थक गए हैं। बडे पुत्र ने हॉ, कर दी। फिर उसने अपने अनुभव बडे पुत्र के साथ साझा किए। उसने कहा कि तुम्हे कई गॉवो में जाकर टोपिया बेचनी है। इसलिए जाहिर हैं कि तुम्हे किसी वृक्ष के नीचे विश्राम भी करना पडे। यह भी संभव हैं कि तुम्हे विश्राम करते करते नींद भी आ जाए। सोने से पहले टोपियो के गटठर को मजबूती से बांध देना। उसने अपने पुत्र को आज उसके साथ घटित घटनाक्रम सेे अवगत कराते हुए कहा-
''मुझे मालूम था कि बंदर, इंसान की नकल करते है। मैनें अपने सिर से टोपी उतारी और बंदरो की तरफ उछाल दी। इसके जवाब में बंदरो ने भी अपने-अपने सिर से टोपिया उतारकर उछाल दी। मैने सभी टोपियों को गटठर में बॉधा और घर चला आया।'’ उसने अपने पुत्र को समझाने वाले अंदाज में कहा -
'’ अगर तुम्हारे साथ भी ऐसी घटना, घटित हो जाए तो घबराना मत। अपने सिर से टोपी उतारकर बंदरो की तरफ उछाल देना। बंदर भी वैसा ही करेगें। ‘‘
पुत्र के बात समझ में आ गई। वह बोला-‘‘ ठीक है, पिताजी। मै कल से टोपियॉ बेचने का काम शुरु कर दूॅगा। वैसे तो मै विश्राम करने से पहले गटठर की गॉठ मजबूती से बॉध लूॅगा। फिर भी खुदा न खास्ता ऐसा वाकया हो गया तो मैं वही करुगॉ जो आज आपने किया।‘‘
उधर, रात को बंदरो ने भी एक सभा का आयोजन किया। वे टोपिया छिन जाने से दुःखी थे। बंदरो का सरदार सुबह से ही दूसरे जंगल में गया हुआ था। अभी-अभी लौटा तो बंदरो ने आज का वाकया अपने सरदार को सुनाया। वह नाराज हुआ और उसने विचार विमर्श हेतु बंदरो की सभा आयोजित कर ली। वह क्रोधित होकर बंदरो को संबोधित कर रहा था-
‘‘ तुम लोगो में बुद्वि नाम की चीज है, या नही । जब परमात्मा बुद्वि का वितरण कर रहा था, तब तुम लोग शायद सो गए थे। बेवकूफो, मानव आज भी हमें नकलची समझता है। मानव हमारा ही विकसित रुप हैं। हमें इस धारणा को तोडना होगा कि इंसान की नकल करना हमारे स्वभाव में हैं। ध्यान से सुनो मूर्खो। अब कभी कोई टोपी बेचने वाला, इस पेड के नीचे सो जाए और तुम टोपिया लेकर नीम पर चढ जाओ तब टोपीवाला अपनी टोपी उतारकर तुम्हारी तरफ उछाल दे तो तुम लोग अपनी टोपिया नही उछालोगे।‘‘
सरदार की बातो को सभी बंदर ध्यान-मग्न होकर सुन रहे थे। उनके चेहरो पर आत्मग्लानि के भाव, साफ-साफ दिखाई दे रहे थे। चारो तरफ सन्नाटा था। इस सन्नाटे पर तब चांटा पडा जब, एक बूढे बंदर ने हिम्मत करके कहा- ‘‘ तो सरदार हमे क्या करना चाहिए ।
‘‘ हमे वह टोपी भी लपक लेनी चाहिए।‘‘ सरदार ने आदेश पारित किया। सभी बंदरो ने हॉ, में अपनी गर्दने हिला दी। इस संकल्प के साथ सभा समाप्त हुई कि वे अब इंसान की नकल नही करेगें। टोपी वाला, उनकी तरफ टोपी उछालेगा तो हम उसकी टोपी लपक लेगे। अपनी टोपिया किसी भी हालत में नीचे नहीं फेकेंगें।
टोपीवाले के पुत्र ने पिता की आज्ञा की अनुपालना में गॉव-गॉव, ढाणी-ढाणी, टोपिया बेचना शुरु कर दिया। जगत में संयोग बहुत होते हैे। उसका पुत्र भी उसी पेड के समीप से गुजर रहा था। उसके मन में आया कि इस घनी छॉव वाले पेड के नीचे थोडा विश्राम करकें फिर आगे चलेगें। वह पेड के नीचे चादर बीछाकर लेट गया। थका हुआ था। कब नींद के आगोश में चला गया, उसे पता ही नहीं चला।
बंदरो का समूह टकटकी लगाए हुए देख रहा था। जैसे ही उन्हे यकीन हो गया कि टोपीवाला गहरी नींद मे जा चुका है। सभी बंदरो की नजरे मिली। वे इस तरह से नीचे उतरे ताकि आवाज नहीं हो। उन्होने टोपियों का गटठर खोला और सभी टोपिया सिर पर ओढकर पेड पर जा बैठे। सभी एक दूसरे की तरफ देखकर किलोलिया कर रहे थे। इसी बीच टोपीवाले की ऑख खुल गई । उसने अपने गटठर को संभाला तो गटठर को नदारद पाया। वह बेचैन हुआ। फिर उसकी नजर पेड पर गई तो देखा कि पेड पर बैठे सभी बंदरो ने टोपिया पहन रखी हैं। वे उसे देखकर दॉत निकाल रहे है। वह मुस्कुराया। उसे याद आया कि उसके पिता ने समझाया था कि बंदंर नकलची होते है। इंसान जैसा करता है वेसे ही बंदर करते हैं। उसने अपनी टोपी सिर से उतारी और बंदरो की तरफ उछाल दी। संयोग से एक बंदर के सिर पर टोपी नही थी। उस बंदर ने वह टोपी भी लपककर अपने सिर पर ओढ ली और दॉत निकालकर टोपीवाले को चिढाने लगा। किसी भी बंदर ने जमीन पर अपनी टोपी नहीं फेंकी ।
टोपीवाला हैरान हुआ। उसने पत्थर फेंकने शुरु कर दिए। पत्थरो से बंदर डरे नही। पत्थर को अपनी तरफ आता देखकर शरीर को आगे पीछे, करके स्वंय को बचा लेते। टोपीवाला निराश होकर, हाथ मलता हुआ, घर की ओर चल पडा। बंदरो की खुशी परवान चढ रही थी। पेड पर उत्सव जैसा महौल हो गया।
देखिए ओशो की कल्पनाशीलता। सदियो से चल रही, परंपरागत कहानी का अंत कैसे रुपांतरित कर दिया। उस दिन मेरे जहन में आया कि हमारी बुद्वि एकतरफा चलती है। दूसरे पक्ष तक जाने की बुद्वि सोच ही नहीं सकती। जैसे वृद्व टोपीवाले ने अपने पुत्र को बंदरो से टोपिया वापस प्राप्त करने की तरकीब बताई थी, वैसे ही बंदरो के सरदार ने भी सभा करके उन्हें गुरु ज्ञान दे दिया था। कहानी के इस अंत से, मुझे भी नए ढंग से कहानियो, कविताओ और किस्सो पर सोचने के लिए एक प्लेटफार्म उपलब्ध करवाया। मेरे सोचने समझने के तरीके में परिवर्तन आता गया। यह ओशो की महान देन है। वरना तो धर्म प्रचारक खुद की कही हुई बात को ब्रहम वाक्य बताते हुए उस पर बिना किन्तु परन्तु के मानने पर बल देते है। संभवतया ओशो एक मात्र प्रवक्ता है जिन्होने प्रत्येक प्रवचन में संदेह करते हुए अपने विवेक का प्रयोग करते हुए मानने के बजाय जानने पर बल दिया। सन सतर से पहले के प्रवचनो का अंत इस तरह होता था-
‘‘ मेरी बातो को इसलिए मत मान लेना की मैने कहा है। यह मेरे अपने अनुभव है। आप इन बातो पर गौर करना। यदि इनमें सत्य होगा तो थोडे से प्रयास से जान जाओगें। मेरी बातो को इतने ध्यान से सुना, इसके लिए अनुगृहित हूॅ। अंत में आपके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूॅ। मेरे प्रणाम स्वीकार हो।‘‘
कैसे अनूठे रहस्यदर्शी है। लोगो के विवेक को जागृत करना चाह रहे हैं। इतिहास गवाह हैं कि किसी भी दार्शनिक और रहस्यदर्शी ने कभी नहीं कहा कि मेरी बातो को इसलिए नही मान लेना की, मैनें कहा हैं। वे तो हमें यह कह रहे हैं कि मेरे कहे हुए पर चिंतन मनन करना और सत्य की कसौटी पर परखना। यदि मेरा कहा हुआ सत्य होगा तो न मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहेगा। दूसरे संतो और रहस्यदर्शियों के साथ ऐसा नही है। वे या तो अपने प्रवचनो को परमात्मा से जोडते हैं या फिर शास्त्रो से। वे कहते है कि जो मै कह रहा हूॅ, वह लोहे की लकीर हैं। यदि इस लकीर के दॉए-बाए गए तो नरक भेज दिए जाओगें। कई लोग अपने प्रवचनो में यह भी कह देते हैं कि मेरे वकत्व शास्त्र समर्थित हैं। इन पर संदेह करोगे तो जीवन भर दुःखी रहोगें। यदि सुबह ब्रहम मूर्त अर्थात फजर में नहीं उठोगे तो पाप लगेगा। ओशो कहते है कि ब्रहम मुहरथ अर्थात फजर में उठना अच्छा है लेकिन तब, जबकि हमारे अतंरमन से ऐसा हों। पाप के डर से ब्रहम मुहरत में जागने से पुण्य नही होगा। जबरदस्ती अलार्म लगाकर उठने से पुण्य का कोई संबंध नही हैं। जब नींद पूरी भर जाए और अंतरमन कहे कि जागो, पक्षी गीत गाने वाले है। योग प्राणायाम और नमाज की तैयारी करो तो सुखानुभूति को अनुभव करोगें। किसी पाप के डर से नहीं। किसी पुण्य की अभिलाषा से नहीं। सिर्फ रात्रि की पूर्णता और सवेरे के आगमन का स्वागत हैं। दुनिया में ऐसे कई लोग है जो रात को सोते तो है लेकिन जाग नहीं पाते। उनकी रात्रि में नींद के दरमियान ही जीवन लीला समाप्त हो जाती हैं। जब भी स्वतः ऑख खुले तो अपने ईष्ट को धन्यवाद देना कि उसने एक शानदार सुबह देखने का एक और अवसर दिया। इस प्रकार ओशो अनुशासन के प्रति कठोर नही हैं। वे आत्मानुशासन के अविष्कारक है। ऐसा अनुशासन, जो आत्मा से जन्म लेता है। ऐसा अनुशासन, जो स्वाभाविक और आत्मस्फुरित हैं। प्रयास रहित। बिना भय के। कुछ लोग रेड लाईट में जुर्माने के भय से प्रविष्ट नहीं होते हैं। चौराह पर पुलिसकर्मी न हो तो वे बेधडक रेड लाईट को पार कर लेते है। ओशो का जीवन भर प्रयास रहा कि ध्यान से लोगो की चेतना विकसित की जाए ताकि चोराहे पर पुलिसकर्मी तैनात हो या नहीं उनके दिमाग में स्वतः ही रहे कि चाहे कोई देख रहा हो या नहीं उसे रेड लाईट पार नही करनी है। कई लोग, चोरी पकडे जाने पर दंड के भय से चोरी नहीं करते हैं। यदि पकडे जाने का भय नही हो तो चोरी कर सकते हैं। एक दूसरी स्थिति ओर भी होती है कि चोरी करने का ख्याल ही नहीं आता। कहीं पर पकडे जाने की दूर-दूर तक कोई आशंका नहीं है। आराम से पराए माल पर हाथ साफ किया जा सकता हैं। फिर भी मस्तिष्क में हाथ साफ करने का विचार ही जन्म नहीं लेता। ओशो इस विचारधारा को अचोरी की संज्ञा देते हैं। यह अचोरी का भाव, भीतर से आता है। अंतरमन से आता हैं। इस भाव की उत्पति के लिए यह समझना जरुरी हैं कि गलत और अवैध कार्य के परिणाम अप्रोक्ष रुप से ही घटित होते है। आग में अभी हाथ देगे तो हाथ अभी जलेगा। हाथ का जलना तुरंत आरंभ हो जाता हैं। ओशो का मानना था कि कार्य का परिणाम तुरंत आता है। मन में उठे वैमनस्यपूर्ण भाव से बैचेनी तुरंत प्रारंभ हो जाती हैं। मस्तिष्क में विचारो का झंझावात हिलोरे लेने लगता हैं। अभी कुछ किया नहीं है। सिर्फ दिमाग में ख्याल आया हैं। इस ख्याल से ही परेशानी का उदभव हो जाता है। यह ख्याल ही अंशांति को जन्म देने के लिए काफी हैं। ऐसे ख्यालो को बलपूर्वक रोकने का प्रयास सफल नहीं होता है। यदि बलपूर्व किसी तरह रोक भी लिया गया तो अवचेतन में फीड हो जाएगा। इसकी जडे नष्ट नहीं होगा। थोडा सा खाद पानी मिला और बीज अंकुरित हुए। ऐसे ख्यालो को जडे चेतना के विकास से ही नष्ट की जा सकती हैे।
चेतना को विकसित करने के तीन साधन है-ध्यान, प्रेम और भक्ति ।
ऐसा नहीं है कि ओशो ने सत्य, प्रेम, चेतना के विकास के लिए सिद्वांतो की ही व्याख्या की है बल्कि वे चेतना विकास हेतु आवश्यक प्रयोग भी विस्तार से समझाते है। ओशो के पेतिंस साल बाद ही एक वाक्य लोगो के मुॅह से सुना जा सकता है कि आज लोगो की भावनाए, भौतिकवाद के युग में अशुद्व हो गई है। ओशो ने सतर साल पहले भाव-शुद्वि पर काम करना शुरु कर दिया था। अन्य लोगो के साथ मैनें भी ओशो के भाव शुद्वि के प्रयोग आरंभ किए तो उनके चमत्कारिक परिणाम सामने आए।
सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि भाव और भावनाए क्या होती है। भाव का अर्थ है-- मानव के भीतर से जागे हुए विचार। व्यक्ति के मन में उठने वाले अलग-अलग अनुभव और प्रतिक्रियाए् भावनाए कहलाती है। जैसे- खुशी, दुखः, गुस्सा, प्यार, डर इत्यादि। अर्थात भावना किसी की आशिंक रुप से मानसिक, आंशिक रुप से शारीरिक प्रतिक्रियाओं को दर्शाती है। खुशी, दर्द, आकर्षण या विकर्षण से चिंहित होती है। यह केवल एक प्रतिक्रिया के अस्तित्व का सुझाव दे सकती है लेकिन प्रतिक्रिया की प्रकृति या तीव्रता के बारे में संकेत भी करती है। इसकी प्रकृति और तीव्रता के बारे में सब कुछ नहीं बताती है। इस प्रकार भावनाए, किसी घटना या स्थिति के जवाब में होती हैं। भावनाओं से जुडी हुई कुछ बातो पर गौर करे तो हम भावनाओ का भावार्थ आसानी से समझ सकेगे-
भावनाओ में खुशी, दर्द, आकर्षण, और विकर्षण शामिल है।
भावनाए, गतिशील होती है इसलिए एक पल में खुश होना और दूसरे पल में दुखीः होना सामान्य बात है।
भावनाए, किसी चीज, घटना या स्थिति के विशेष महत्व को दर्शाती हैे।
भावनाए, मन की शांति, शारीरिक संवेदना और हाव-भाव का एक जटिल अनुभव माना जाता है।
भावनाए किसी ऐसी कार्रवाई या घटना से जुडी होती है जो इतिहास में घटित हुई हो या भविष्य में हो सकती है।
मेरियम का मानन है कि भावनाए, मस्तिष्क की गतिविधियो का परिणाम होती है। मस्तिष्क के विभिन्न भाग जैसे एमिग्डाला, हिप्पोकेम्पस और प्रीफ्रटल कांर्टेक्स, भावना को उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिक निभाते है। डाक्टर मेगन अन्ना के शोध के अनुसार भावनाए, मानसिक और शारीरिक अवस्थाओं का जटिल गठजोड है। वे आनंद के उल्लास से लेकर उदासी के जोश, भय के आवेग, आश्चर्य के झटके और घृणा के प्रति घृणा तक सब कुछ समेटे हुए है। वे केवल क्षणिक भावनाए नहीं है वे हमारे विकल्पों, कार्यो और सामाजिक अंतःक्रियाओं को प्रभावित करने वाले शक्तिशाली कारक है जो हमारें स्वास्थय और कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान जेसे विषयों को जोडते हुए भावनाओ का अध्ययन, उनके जटिल कामकाज और मानव व्यवहार पर उनके प्रभावो को उजागर करने का लक्ष्य रखता है।
डाक्टर मेगन के शोध के अनुसार भावनाए, हमारी शारीरिक संवेदनाओ के बारे में बताई गई कहानी के संयोजन से उत्पन्न होती है। हमारी शारीरिक संवेदनाए संकेतो के रुप में कार्य करती है, जो हमारे आंतरिक और बाहरी वातावरण के बारे में जानकारी प्रदान करती है। हॉलाकि, इन संवेदनाओं के बारें में हमारे मन की धारणा और विश्वास विशिष्ट भावनाओं को जन्म देते है। शोधो से यह तथ्य भी उजागर हुआ है कि भावनाओं की उत्पत्ति और उनके प्रकटीकरण में मन की भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई है। जिन भावो को, हमारे विचारो ने जन्म दिया होता हैं उससे हमारा जीवन प्रभावित होता हैं। जीवन की सकारात्मक और नकारात्मक यादें और अतीत हमारे वर्तमान को भी प्रभावित करता हैं। भावनाए संस्कृति से भी प्रभावित होती है। जैसे कई संस्कृतियॉ भावनाओ को अभिव्यक्त करने की पूर्ण स्वतंत्रता देती है लेकिन कई संस्कृतियों मे भावनाओ को व्यक्त करने का सीमित दायरा होता हैं। भावनाए हमारे निर्णय लेने की शक्ति को भी प्रभावित करती हैं। भावनाओ से निजी रिश्ते भी प्रभावित होते हैं। जब हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते है जो हमारी विचारधारा का होता है तो उससे मिलन प्रीतिकर लगता है। हमारे पसंद के व्यक्ति से मिलन, प्रेम भाव को ओर प्रगाढ करता हैं।
हम यह भी कह सकते है कि भाव, मन के क्षणिक आवेग से मस्तिष्क कार्यशील होकर आवेग के अनुसार कार्य करने को प्रवृत होता है जबकि विचार, शुद्व मानसिक संवेदना के कारण उत्पन्न होनें से, इनमें तुलनात्मक रुप से अधिक स्थायित्व होता है। अतः इनमें दूरदर्शिता प्रकट होती हैं। विज्ञान के अनुसार हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती हैं। हमारी क्रिया सकारात्मकता व स्वच्छ मनोभावयुक्त होगी तो परिणाम भी सुखद होगें। यह प्रश्न फिजूल हैं कि हम किसी के प्रति शुभ विचार रखे और सामने वाला हमारे प्रति अशुभ विचारो से भरा हुआ हो तो हमें भी उसके जैसा हो जाना चाहिएघ् नही। बुर्जुगो ने कहा हैं कि नेकी कर और दरिया में डाल। ओशो एक बोध कथा सुनाते है- एक व्यक्ति का नए गॉव में आगमन हुआ। उसने एक वृद्व व्यक्ति से पूछा कि मै इस गॉव में बसना चाहता हूॅ। आप तो बुजुर्ग है कृपया मुझे बताए कि यहॉ के लोग कैसे है।उस बजुर्ग सज्जन ने इस प्रश्न का उत्तर तो नहीं दिया बल्कि प्रतिप्रश्न के रुप में उस व्यक्ति को गौर से देखकर पूछा-‘‘ तुम जिस गॉव से आए हो उस गॉव के लोग कैसे हैं।'’
आगंतुक ने सपाट स्वर में कहा- ‘‘उस गॉव के लोग बेईमान, झुठे और मक्कार है।‘‘
‘‘ परंतु इस गॉव के लोग तो बेईमान, झूठे, मक्कार के अलावा हिसंक भी है। बिना गाली के बात करने के आदि नहीं है।‘‘ उस बुजुर्ग ने जवाब दिया।
वह व्यक्ति तो बुजुर्ग की बात सुनकर चला गया। एक घंटे बाद उस बजुर्ग के पास किसान जैसा नजर आने वाला व्यक्ति आया और उसने, उसी बुजुर्ग से पूछा-‘‘मै पास के ही गॉव में रहता हूॅ। जमीन में पानी खत्म हो जाने से रोजगार नहीं रहा। मै इस गॉव में रहकर गुजर बसर करना चाहता हूॅ। यहॉ के लोग कैसे है, बाबा।
बुजुर्ग ने वही प्रश्न दोहराया-‘‘ तुम जिस गॉव को छोडकर आ रहे हो, वहॉ के लोग कैसे है।'’
‘‘ उस गॉव के लोग बहुत अच्छे हैं। सभी प्रेम से रहते है। वहॉ जमीन में पानी खत्म नही होता तो मै कभी भी उस प्यारे गॉव को नहीं छोडता। ‘‘
‘‘ इस गॉव के लोग प्रेम भाव से ओतप्रोत हैं। शिक्षित है। बाहर से आकर बसने वालो को अतिथि का दर्जा देते है। आतिथ्यपूर्ण है। भले लोग रहते हैे। ‘‘
आगंतुक खुश हुआ। उसने मन ही मन सोचा कि उसका चुनाव अच्छा रहा। इस प्रकार जिसकी, जैसी सोच, वैसे ही उसके भाव। कबीरदास भी कहते है-मै बुरे व्यक्ति की खोज में निकला था लेकिन मुझे कोई बुरा आदमी ही नहीं मिला। जब मैने मेरे भीतर झॉककर देखा तो पता लगा कि मुझसे बुरा तो कोई नहीं हैं।
समाज, परिवार और परवरिश मिलकर भावो को शुद्व या अशुद्व करने का काम करते है। भाव, जीवन की दशा और दिशा के निर्धारक है। जो भाव, समाज की गला काट प्रतियोगिता की होड के कदमे में कुचलकर अशुद्व हो चुके है। उन्हे शुद्व किया जा सकता है। ओशो ने साठ साल पहले महाबलेश्वर के प्रकृतिक वातावरण में एक घ्यान शिविर का आयोजन किया था। इस शिविर में सदगुरु ओशो नें भावो को शुद्व करने के उपाय भी सुझाए हैं। जिन लोगो नें इन उपायो को इमानदारी और लगन से आजमाया उन लोगो के अनुभव शानदार रहें। सर्वप्रथम आघ्यात्म की दृष्टि से भावो पर विचार करते है फिर ओशो के द्वारा सुझाए गए घ्यान प्रयोगो का विवेचन करते है।
ओशो ने भावनाओ को मानव जीवन में उच्च स्थान दिया है। भाव शुद्वि की उपयोगिता शरीर शुद्वि और विचार शुद्वि से कई माइनो में अधिक मानी गई है। मानव अपने भावो से सर्वाधिक प्रभावित होता हैं। प्रेम, घृणा और क्रोध भावो से प्रभावित होते हैं। ओशो कहते हैं कि अधिकांश व्यक्तियो को मालूम है कि क्रोध से खराब कोई स्थिति नहीं है। ज्यादातर अपराध क्रोध की देन होते है। लोग संकल्प भी करते है कि वे क्रोध नहीं करेगें लेकिन जब क्रोध मानव को पकडता है तो संकल्प धरे रह जाते है। ऐसा क्यो होता है कि जब हम विचार के तल पर क्रोध नहीं करने का प्रण कर लेते है फिर भी जीवन में प्रयुक्त नहीं कर पाते हैं। इन्हे जिंदगी के सफर में हमराह बनाना होगा। फिर सफर प्रतिकर हो सकता है। फिर यक्ष प्रश्न खडा होता हैं कि भाव और विचार जीवन को कैसे रुपांतरित कर सकते हैे। आशो के अनुसार जीवन तब रुपांतरित हो सकता हैं जबकि भाव शुद्व हो जाए। लेकिन भाव शुद्वि के लिए भी साधना करना आवश्यक हैं। ऐसा नहीं हैं कि हमने विचार किया कि भाव शुद्व हो जाओ और भाव शुद्व हो गए। सामाजिक परिवेश और परवरिश के तरीको ने भावो को अशुद्व करने में कोई कसर नहीं छोडी है। भाव कब अशुद्व होते है, ओशो के अनुसार भाव, तब अशुद्व होते है जब मैत्री, घृणा में, करुणा क्रूरता में, प्रफुल्लता संताप में और कृतज्ञता अकृतज्ञता में परिवर्तित हो जाए। इस प्रकार भावो की शुद्वि हेतु चार भावो की साघना करनी होगी। ओशो ने इस साधना के लिए चार भाव सुझाए हैं- मैत्री, करुणा, प्रफुल्लता और कृतज्ञता।
सर्वप्रथम मैत्री पर विचार करते है। ओशो ने मेत्री को मित्रता के समकक्ष न मानकर इसे उच्च स्थान दिया हैं। मेत्री की गहराई में जाते हुए ओशेा ने कहा कि बाहरी जगत हमें वस्तुओ और चीजो में नजर आता है। भीतरी जगत, संवेदनाओ से मनुष्य को घेरे हुए हैं। इसके लिए हमे संपूर्ण जगत के प्रति भीतर एक मैत्री का भाव उत्पन्न करना होगा। हमें अपने चित्त में यह बात बैठानी होगी कि मेरा किसी भी व्यक्ति, पशु, पक्षी, पेड पौधो से कोई वैर नहीं है। मेरी संपूर्ण जगत के प्रति मैत्री हैं। हमारे चित्त में जितनी घृणा और ईर्ष्या की भावना होगी, उतना ही हमारा चित्त अंशात और उद्वीग्न होगा। चित्त की शांति के लिए मैत्री की साधना प्रथम सौपान है। मैत्री की साधना इतनी सरल है कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते। ऐसी सरल साधना से मनुष्य हजारो सालो से वचिंत रहा। ओशो ने प्रथम बार भाव शुद्वि का प्रथम द्वार मैत्री को घोषित कर मानव के चित्त को अंशाति के भंवर से निकालने का प्रयास कियां । ओशो कहते है कि मैत्री की साधना से सरल कोई साधना नही है। हम दैनिक दिनचर्या का कोई भी कार्य कर रहें हो या एकांत में बैठे हो तो अनुभव करे कि मेरे चारो तरफ एक मैत्री का घेरा निर्मित हो रहा है। पूरी कायनात मेरे साथ मैत्री से लबालब भरी हुई हैं। मेरे भीतर भी संपूर्ण कायनात के प्रति मैत्री के फूल खिल रहे हैं। मुझे मैत्री के फूलो की खुशबू आनंदित कर रही हैं। इस खुशबु से मेरे भीतर शांति की लहर दौडने लगी हैं। ऐसी प्यारी कल्पना से मैत्री के बीज हमारे भीतर अंकुरित होना आरंभ हो जाएगे। जो कुछ भी नजर आए। उसके प्रति भाव करे कि मै उसके प्रति मैत्री से सरोबार हूॅ। मैत्री से भरा हुआ हूॅ। लोगो से मिले तो अनुभव करे कि आपका उनके प्रति मैत्री भाव दिन दूना रात चौगुना बढने लगा है। इसका परिणाम यह होगा कि आपका चित्त मैत्री के अनुपात में शांत होना आरंभ हो जाएगा । आपके भीतर प्रेम की कौपले फूटने लगेगी। आप प्रेम जगत में मात्र कल्पना करने से ही विचरण करने लगेगे। जो अकेलापन काटने को दौडता था। वही अकेलापन, एकांत में रुपानतरित्र होकर आनंद और शांति का प्रतीक बनता जा रहा है।
जब मेरे हाथ मैत्री की कीमिया लगी तो मैने इसकी सत्यता को परखने के लिए प्रयोगो का शुभारंभ कर दिया। ओशो द्वारा इजाद की गई कीमिया नूतन और मौलिक थी इसलिए सुसंगत दृष्टांत किसी भी शास्त्र में नही मिले। बिना किसी पूर्व दृष्टांत के प्रयोग आरंभ करने पडे। मुझे सडक पर कोई कुत्ता भी नजर आता तो मै उसके प्रति भी मैत्रीपूर्ण होकर देखता तो मुझे ऐसा प्रतीत होता कि कुत्ता भी मैत्रीभाव, मेरी तरफ प्रवाहित कर रहा है। बाजार और गली मोहल्लो से पैदल गुजरते हुए जिन कुत्तो से भूत जैसा भय लगता था। वह भय धीरे-धीरे तिरोहित होने लगा। मै प्रत्येक आवारा कुत्ते के प्रति मैत्री भाव से देखता और ह्रदय में उनके प्रति मैत्री भाव प्रवाहित करता तो न तो कुत्ते मेरी तरफ भौकते और ना ही मुझे डराने का प्रयास करते। मै उनके प्रति मैत्रीपूर्ण हुआ और वे मेरे प्रति मैत्रीपूर्ण हो चले गए। अब मुझे किसी भी गली मोहल्ले से पैदल गुजरते हुए भय लगना समाप्त हो चुका था। जीवन में पहली बार शांति का अविर्भाव हुआ तो मैान, पंख पसारने लगा। अकेलापन खलता नही था बल्कि आनंद की अनुभूति कराता। लेकिन परिजनो और हितेषियो के लिए मौन अनुभव का विषय नही था। इसलिए उन्होने मुझ पर ’प्रश्नो की बौछार करना शुरु कर दिया। कोई मुझसे पूछता कि मै इतना उदास क्यो रहता हूॅ। कोई मुझसे पूछता कि तुम लोगो के कटु वचनो पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं करते हो। कोई कहता कि तुम इतने धीमे क्यों बोलते हो। कोई कहता कि तुम्हारी चंचलता कहॉ खो गई। किसी हितेषी का प्रश्न होता कि क्या मैं सन्यस्त होने की दिशा में आगे बढ रहा हूॅ। आसपास के लोग को मेरे चित्त की शांति, उदासी का पर्याय लग रही थी। मै न तो किसी को अपना स्पष्टीकरण दे रहा था और ना ही उनसे कोई प्रतिप्रश्न कर रहा था। हॉ, इतना जरुर था कि जो हितेषी, चित्त की शांति के प्रति उत्सुक होता और मौन का स्वाद चखने की आकांक्षा करता, उसे मै मैत्रीपूर्ण होने के सूत्र अवश्य समझा देता। कई बार तो शुभचिंतका ने यहॉ तक कह दिया कि मै उनसे अलौकिक सूत्रो के बारें में कह रहा हूॅ। जिन्हे कभी शांति की झलक मिलती उनके परिजन यह जानने की कोशिश जरुर करते कि उनके पुत्र में यह परिवर्तन कैसे हुआ। वे अपनी संतानो से कई प्रकार के प्रश्न भी पूछते लेकिन वे संतोषजनक जवााब देने की स्थिति में नहीं होते थें।
शायद 1984 का साल था। मेरी आयु अब बीस वर्ष हो रही थी। कई मित्रो ने पूछा कि तुम प्रत्येक कार्य को पूरे मनोयोग और आनंद से संपादित करने की बात कहते हो, हम ऐसा करते भी हैं। हमें, अब कुछ अच्छा-अच्छा भी लगने लगा है लेकिन हमारे परिजन नाराज हैं। उनका कहना है कि हम लोग उदास और निष्क्रिय होते जा रहे है। क्या जवाब देवे। हमें पूछते है कि तुम्हे कोई षडयंत्र के जाल में फंसा रहा है।
फिर मैने मित्र से पूछा-‘‘तुमने क्या जवाब दिया।‘‘
‘‘ हमने तो तुम्हारा नाम बता दिया। यह भी बताया कि हम प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति, पेड पौधो और पशु पक्षियो को मैत्रीपूर्ण दृष्टि से देखते है। हम मन मे भाव करते है कि हमारा किसी के साथ कोई बैर नही है। अब मेरे पिता और ताउजी तुमसे मिलना चाहते है।‘‘
‘‘ठीक है। कल रविवार है। कॉलेज की छुटटी है। मै ही तुम्हारे घर आ जाता हूॅ। ‘‘
‘‘ शाम को पॉच बजे आ जाना। ‘‘ मित्र ने समय नियत कर दिया।
मैंने उस रात ओशो का एक प्रवचन सुना। प्रवचन में ओशो किसी विषय को एक बोधकथा के माध्यम से समझाने का प्रयास कर रहे थे। ओशाे, अपनी अमृत वाणी में कह रहे थे कि एक राहगीर छोटी सी पहाडी को देखने गया। राहगीर जिज्ञासु प्रवृति का व्यक्ति था। उसने देखा कि उस छोटी सी पहाडी के समीप ही किसी मंदिर के निर्माण का कार्य चल रहा था। पहाडी पर कई मजदूर पत्थर तोड रहे थे। उस राहगीर ने पत्थर तोड रहे एक मजदूर से पूछा-
‘‘ क्या कर रहे हो, मेरे मित्र।‘‘
‘‘ दिख नहीं रहा क्या, पत्थर तोड रहा हूॅ। एक तो कठोर पत्थर और उपर से यह धूप, कोढ में खाज का काम कर रही हैं। भुगत रहे है, पिछले जन्मो के कर्मो का फल।‘‘
‘‘ नाराज क्यों हो रहे हो मित्र। मैने तो यू ही पूछ लिया था। ‘‘
‘‘ साफ दिख रहा था कि कडी धूप मे पत्थर तोड रहा हूॅ। फिर भी पूछ रहे हो। लगता हैं, ऑखों की रोशनी कमजोर हो गई हैं।‘‘
राहगीर उसकी पीडा को सुनकर आगे चल पडा। पहाडी के उपर चढा तो दूसरा व्यक्ति पत्थर तोडता हुआ दिखाई दिया। उसने रुककर, उससे विनम्र शब्दो में पूछा-‘‘ क्या कर रहे हो मित्र।
‘‘ पास में ही मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा हैं। उसके लिए पत्थर तोड रहा हूॅ।‘‘ उसने निराशात्मक लहजे में जवाब दिया। राहगीर और आगे बढा तो उसने देखा कि एक व्यक्ति पत्थर तोडता हुआ कोई लोकगीत गुनगुना रहा है। देखने में थका हुआ भी नजर नहीं आ रहा हैं। हथोडे की चोट पत्थर पर मारकर परिणाम की प्रतीक्षा भी कर रहा हैं। किसी भी दृष्टिकोण से परेशान नजर नहीं आ रहा था। राहगीर ने मुस्कुराकर पूछा-‘‘ क्या कर रहे हो मित्र।
‘‘ इस गॉव में भगवान का पहला मंदिर बन रहा हैं। उसी मंदिर के लिए पत्थर तराश रहा हूॅ। मेरे हाथ का तराशा हुआ पत्थर भगवान के मंदिर के निर्माण में सहयोगी होगा।‘‘ वह अपने अधूरे लोकगीत को पूरा करने में लग गया।
‘‘ इस कडी धूप में परेशानी तो हो रही होगी, मित्र। ‘‘ उसने मानवता के नाते पूछ लिया।
‘‘ कौनसी परेशानी, मेरे मित्र। बरसो से इस पहाडी के पत्थर तोडकर परिवार की गुजर बसर कर रहें हैं। इन पत्थरो से ही तो मेरा परिवार पलता हैं। अब तो इन पत्थरो से भगवान का मंदिर बन रहा है। जब मंदिर पूर्ण होकर, पूजा अर्चना शुरु हो जाएगी, तब मैं आनंदित होउगॉ कि मेरे तराशे हुए पत्थरो से मंदिर की बुनियाद रखी गई थी।‘‘ बोलते बोलते उसकी खुशी परवान चढने लगी।
राहगीर आश्चर्यचकित हुआ। उसने कभी ख्याल नहीं किया था कि तीन लोग भरी दोपहर में पहाडी से पत्थर तोड रहे हैं। लेकिन तीनो की स्थिति नितांत भिन्न हैं। पहला तो इतना दुःखी हैं कि पूछने वाले को अंधा बताकर अपनें कार्य का पिछले जन्म के कर्मो से संबंध स्थापित कर रहा है। दूसरा दुःखी है लेकिन दुःख की मात्रा थेाडी कम हैं। तीसरे को न धूप से परेशानी है न पत्थर तोडने सें। राहगीर सामान्य व्यक्ति नहीं था। पहुॅचा हुआ संत था।
निष्कर्ष यही निकला कि जो लोग कार्य को ही ध्यान बनाकर उससे आनंदित होते है तो गिले शिकवो की उत्पति ही नहीं होती। तीसरे व्यक्ति की पत्थरो से मैत्री स्थापित हो गई। हमें खुद को ही खोज करनी होगी कि हम वैमनस्य से प्रभावित होते है या मैत्री से। यदि हमारा जीवन वैमनस्यता और घृणा से अधिक प्रभावित होता हैं तो हमें समझ लेना चाहिए कि जीवन दुःख के मार्ग पर जा रहा है। यह सही है कि वेमनस्यता और शत्रुता में अपार शक्ति होती हैं। ओशो तो स्पष्ट कहते हैं कि जब सच्ची या झूठी, शत्रुता को आमजन के मस्तिष्क में बैठा दिया जाए, तो आमजन स्वयं को शक्तिशाली समझने की गलतफहमी पाल लेगा। बार-बार, पडौसी देश के हमले की आशंका का बीज आमजन के जहन में अंकुरित कराने का प्रयास ही आमजन में पडोसी देश के प्रति घृणा और वैमनस्यता पैदा कर देगा। इस प्रकार शत्रुता के भाव में शक्ति तो है लेकिन मैत्री भाव में उससे कई गुना अधिक शक्ति है। मैत्री भाव का अभ्यास नही है इसलिए इस भाव की शक्ति के प्रति अज्ञानता है। शांतिकाल में देश शिथिल हो जाता है और युद्वकाल में लोगो में शक्ति का प्रादुर्भाव होने लगता है। हमने शांतिकाल का सदुपयोग करना नहीं सीखा। वरना शांतिकाल में तो शक्ति का संचार होना चाहिए।
ओशो ने महाबलेश्वर के शिविर में कहा था कि जर्मनी और जापान की संपूर्ण शक्ति की आधारशीला ही वेमनस्यता रही है।
खैर। मै वायदे के मुताबिक ठीक पॉच बजे मेरे मित्र के घर पहुॅचा। मित्र के ताउजी ने हिकारत भरी दृष्टि से मुझे उपर से नीचे तक देखा जैसे कि मैं चिडियाघर से भागा हुआ कोई जन्तु हूॅ। मेरे मित्र ने अपने पिता और ताउ से मेरा परिचय करवाया। मेरी आयु उस वक्त बीस वर्ष हुई ही थी। मताधिकार का हक नहीं मिला था। औपचारिक बातो के बाद वे विषयवस्तु पर केद्रिंत हुए। अंग्रेजी के प्राध्यापक थे। वार्तालाप में ज्यादातर अंग्रेजी के शब्दो का इस्तेमाल करने के आदि थे। उन्होने पूछा- ‘‘तुम मैत्री भाव कहॉ से ले आए। मालूम है यदि कोई पर्सन, यूनिवर्सल के प्रति मैत्रीपूर्ण हो जाएगा तो करने को बचेगा ही क्या।
‘‘ सर। मानव अंशांत और उद्वीग्न है। बैचेन हैं। मैत्री से बेचैनी और उद्वीग्नता का ग्राफ नीचे आ सकता हैं। जीवन रस, चेहरे से झलकने लगता है। जो चेहरे मुरझाए हुए है वे आभायुक्त हो सकते है।.हम---‘‘ उन्होने मुझे बीच में ही अपनी वाणी पर ब्रेक लगाने को विवश कर दिया।
वे झल्लाकर बोले-‘‘मैने सिर्फ यह पूछा था कि यदि हम पूरे यूनिवर्सल के प्रति मैत्रीपूर्ण हो जाएगे तो हमारे पास करने को क्या बचेगा। स्टेट लेवल के एग्जाम में कंपिटिशन होता है उसके दूसरे कमपिटिटर को पीछे धकेल कर आगे निकलने पर ही कामयाबी मिलती हैं। लेकिन तुम्हारी मैत्री की थ्योरी से तो सब कुछ चौपट हो जाएगा। चले है, प्रिमेच्योर बच्चो का ब्रेन वाश करने। यह थ्योरी कमपिटिशन की दुश्मन साबित होगी। दुश्मन।‘‘ वे आखिरी शब्द बोलते-बोलते हॉफने लगे। मेरी तरफ यूॅ देखने लगे कि अब इसकी जुबान पर अलीगढी ताला लग जाएगा। मुझे, अपने नजर के चश्में के नीचे से घूरने लगे। आयु का अंतराल था। मोहल्ले के रहने वाले थे। बडे होने के नाते मेरे मन में उनके प्रति आदर भाव था। अंग्रेजी के प्राध्यापक थे इसलिए मुझे लगता था कि उन्होने काफी-कुछ पढा होगा। मेरी धारणा उनके उपरोक्त विचारो को सुनकर खंडित हो चुकी थी। फिर भी मैने अपने शब्दकोष के सम्मानजनक शब्दो को चयनित कर उनसे निवेदन किया-
‘‘आप दूसरे को हराकर विजय पताका फहराने का विचार अपने विधार्थियों के अवचेतन में बैठा रहे है। इससे आपके विधार्थी हिसंक तो हो सकते है लेकिन शांत और करुणावान नही हो सकेगें। उनको अपनी परफोरमेंस को बेहतर करने की उतनी फिक्र नही है जितनी दूसरो को चारो खाने चित्त करने की। मैत्रीपूर्ण भाव से उनके अवचेतन में एक ही बिंदू रहेगा कि कैसे वह अपनी क्षमता की ग्रंथियो को एकजुट करके बेस्ट परफोरमेंस दे सके। बिना मैत्री का केंद्र जागृत किए, ऐसा करना मुमकिन नहीं हो पाएगा। ‘‘
‘‘ मेरा भतीजा स्टेट लेवल के एग्जाम में सक्सेस हुआ है। उसने कभी मैत्री का पाठ नही पढा। बल्कि यह कहना प्रोपर होगा कि उसने मित्रता शब्द तो सुना होगा लेकिन मैत्री शब्द ही उसकी डिक्शनरी में नहीं होगा। फिर बताओ वह सक्सेस कैसे हुआ?‘‘ उनका लहजा आक्रामक होता चला गया। उनको लगा कि अब मै निरुत्तर हो जाउगॉ।
‘‘सर। मेरा कहने का मतलब यह नही हैं कि बिना मैत्रीभाव को साधे कम्पिटिशन में सक्सेस नही हुआ जा सकता। मै तो यह निवेदन करना चाहता हूॅ कि मैत्रीभाव से चित्त शांत होता है। सकारात्मक सोच के बीज अंकुरित होते हैं। प्रतियोगिता और शत्रुता बहिकेंदित होती है और प्रेम और मैत्री का बाहरी व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं हैं। प्रेम और मैत्री अंतःकेंदित होते हैं। शत्रुता, दूसरो से संबंधित होती है। प्रेम स्वयं से ताल्लुक रखता हैं। प्रेम के झरने भीतर से प्रवाहित होते हैं। घृणा तो बाहर की प्रतिक्रिया से आरंभ होती हैं।‘‘ मैने सोचा कि शायद मैं अपनी बात केा पूर्णतया स्पष्ट करने में समर्थ रहा हूॅ।
हुआ भी यही। उनके चेहरे पर विशेष प्रकार की लकीरे सिकुडने और फैलने लगी। वे गहरी सोच में पड गए। बहुत ही नपे-तुले शब्द उनके मुॅह से निकले- ‘‘ यह थोटस तो नए हैं। मैने कभी इस ढंग से सोचा नही।‘‘ उन्हाने हथियार डाल दिए। स्वयं को असहज महसूस करने लगे। उनके चेहरे पर कई भाव आए और गए। उन्होने गिलास उठाया। दो घूॅट पानी पीकर, खुश्क गले को तर किया और पूछ ही लिया-
‘‘ ये नए थोटस तुम्हारे दिमाग में आए कहॉ से ?‘‘
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। वे हताश हुए। कुछ सोचकर ,कहने लगे-‘‘ ये थोटस तुम्हारे माइंड की इजाद तो नहीं हैं। सही-सही बताओ, किस थिंकर के थोटस है ?‘‘
मैं फिर मौन रहा। अब मुझे भी आनंद आने लगा। वे यह तो मान चुके थे कि जो मैं कह रहा हूॅ। वह सत्य हैं। चूॅकि मेरी आयु उनसे आधी भी नहीं थी। इसलिए उनका अंहकार उन्हे यह स्वीकार करने नहीं दे रहा था कि वे अपने मुॅह से कह सके कि हॉ, यह सत्य हैं। मै मौन रहा तो उन्होने फिर पूछा-‘‘ तुमने बताया नहीं कि ये थोटस किसके है ?‘‘
‘‘ थेाटस किसी के हो, इससे क्या फर्क पडता हैं,सर ? मूल बात तो यह हैं कि ये सत्य है या नही।‘‘
‘‘ मुझे थिंकर का नाम जानना है। प्लीज मुझे बताए।‘‘ अब उनका लहजा, निवेदनात्मक हो गया था।
मैनें कोई जवाब नहीं दिया। मै फिर मौन रहा। अब उनकी जिज्ञासा परवान चढने लगी। थिंकर का नाम जानने के लिए बैचेन होने लगे। मेरा मित्र पास की कुर्सी पर बैठा हुआ था। उसने मेरा हाथ दबाकर संकेत दिया कि थिंकर का नाम बताओ, वरना ताउजी नाराज हो जाएगे। लेकिन मैने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। मित्र ने मेरी कमर में फिर हुददा मारा। फिर मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। वे अब ज्यादा ही परेशान हो गए। उन्होने एक-एक शब्द चबाते हुए मेरी तरफ देखकर कहा-‘‘ थिंकर का नाम बताओ।‘‘
मैं फिर मौन रहा। उनके चेहरे पर गर्दिश कर रहे भावो को देखता रहा। उनकी जिज्ञासा सातवे आसमान पर थी। पहलू बदलने लगें। हमारे बीच तनावपूर्ण सन्नाटा छा गया। वे थिंकर का नाम जानने के लिए बेताब होते जा रहे थे। मैं मूर्तिवत बैठा रहा । इन्ही मुद्राओ में दस मिनट गुजर गए।
आखिरकार प्राध्यापक महोदय नें सन्नाटे को तोडा। बोले-‘‘ मुझे थिंकर का नाम बताओ। मै, पूरी थ्योरी पढुगॉ। कौनसी किताब में यह थ्योरी पब्लिश हुई है। मै उस किताब को पढना चाहुगॉ।‘‘
अब मुझे यकीन हो गया था कि महाशय बिना थिंकर का नाम जाने मुझे छोडने वाले नही हैं। मजबूर होकर मुझे कहना ही पडा-‘‘ सर। यह थोटस आचार्य रजनीश के है।‘‘ मेरा इतना कहना, समीप ही किसी बम फूटने के समान साबित हुआ। प्राध्यापक महोदय को ऐसा लगा जैसे, किसी ने उनके कानो में, मैनें पिघला हुआ शीशा डाल दिया हो। वे गुस्से की ज्यादती की वजह अपनी मुठिठयों को जोर लगाकर भींचने लगे। उनकी मुख मुद्रा ऐसी हो गई, जैसे मैनें उनके मुॅह में जबरदस्ती कुनेन डाल दी हो। अपनी सम्पूर्ण शक्ति को एकजाइ करके चिल्लाए-
‘‘ दिया-बत्ती के वक्त किस नास्तिक का नाम ले लिया। रजनीश ने लोगो को नास्तिक बनाने का आंदोलन शुरु कर रखा है। लेकिन इस आंदोलन को हम कामयाब नहीं होने देंगे। वह लोगो का धर्म से यकीन उठा रहा हैं। हम तो उसका नाम तक जुबान पर नहीं लाते है। तुम उसके थोटस स्टूडेंटस के जेहन में डालकर धर्म को नुकसान पहुॅचा रहे हो। हम, इसे बर्दाश्त नहीं करेगें।‘‘ वे मेरे मित्र और अपने भतीजे को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए गरजे- ‘‘ आज के बाद, इसके साथ रहा तो मुझसे बुरा कोई न होगा। तुम इस जाल को समझ नहीं रहे हो। यह तुम्हारा ब्रेन वाश कर रहा है।‘‘
वे हॉफने लगे। मैने हिम्मत करके पूछा-‘‘सर, क्या आपने आचार्य जी कोई पुस्तक पढी है? ‘‘
‘‘मै क्यो पढुॅ, उस नास्तिक की बुक को। मैने लोगो से सुना है कि वह एक आला दरजे का नास्तिक आदमी है। विदेशियो और धनवानो को अपने सम्मोहन के जाल में फॅसाकर उनका ब्रेन वाश कर रहा है तभी तो सरकार नें उसे अमेरिका भेज दिया। वह भारतीय समाज के लिए खतरा हैं। ‘‘ गुस्से की ज्यादती के कारण उनका संपूर्ण शरीर कॉपने लगा। मैने हिम्मत जुटाकर कहा-
‘‘ सर, आपने उन्हे पढा नही। आपने उन्हे सुना नहीं। मेरे ख्याल से बिना पढे, बिना सुने, किसी व्यक्ति के लिए ऐसी धारणा बनाना, आप जैसे शिक्षाविद के लिए उचित नहीं हैं। ‘‘ मेरी इन तीन पंक्तियों ने आग में घी डालने का काम किया। वे बुरी तरह भडक गये। आपे से बाहर हो गए। जैसे मैने उन्हे कोई गाली दे दी हो।
‘‘ तुम मुझे सिखाओगे कि शिक्षाविद को क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। जितनी तुम्हारी उम्र नहीं हुई उससे ज्यादा तो मेरी सर्विस हो गई। उसके पास सम्मोहन के अलावा कुछ नहीं है। मैने तो यहॉ तक सुना हैं कि उसके प्रवचनो की कैसिट में भी सम्मोहन के वायरस हैं। जो एक बार उसकी कैसिट को सुन लेता है, उसी का मुरीद होकर रह जाता हैं। मुझे मेरे धर्म से भटका देगा। बहुत खतरनाक आदमी मालूम होता हैं।‘‘
‘‘ सर, आप कोई पुस्तक पढ लेते तो आपको हकीकत का पता चल जाता। जिन लोगो ने आचार्यजी के बारे में दुष्प्रचार किया है। उन लोगो ने भी बिना उनकी कोई पुस्तक पढे, गलत धारणाए बना ली हैं। मेरा विनम्र अनुरोध है कि आप उनकी कोई एक पुस्तक पढ लें। फिर आपको कुछ गलत लगे तो दूसरी मत पढना। पुस्तक मैं उपलब्ध करवा दूॅगा। आप कहे तो मै प्रवचनो की कैसिट भी------।‘‘
मुझे वाक्य पूरा नहीं करने दिया। उससे पहले ही वे फुर्ती से कुर्सी से उठे और बडबडाते हुए घर के भीतर चले गए। मेरा मित्र शर्मिदा हो गया। ऐसा लगा जैसे किसी ने उस पर घडो पानी उलीच दिया हों। वह ताउजी की चेतावनी से भयभीत भी हो गया था। मैने उसे कुछ कहना उचित नहीं समझा। मैं भी एक शिक्षाविद का मानसिक स्तर देखकर घर लौट आया।
उस दिन के बाद वे सज्जन मुझसे दूर रहने लगे। रास्ते में कहीं नजर आ जाते और मैं अभिवादन भी करता तो वे जवाब देने के बजाय तेजी से निकल जाते। मित्र ने भी दूरिया बना ली। उसने अपने ताउजी के वकतव्यो से अन्य सहपाठियो को अवगत कराया तो वे भी अपने परिजनो के प्रकोप से मेरे नजदीक नहीं आ रहे थे। हॉलाकि वे मुझसे प्रेम रखते थे फिर भी परिजनो के प्रकोप के शिकार होने का भय उनके जहन मे बैठ गया था। 1984-85 में ओशो को लेकर ऐसा दुष्प्रचार चल रहा था। कोई पुस्तक पढने को तैयार नहीं था। एक ने दूसरे को कहा, दूसरे ने तीसरे को और यह श्रृखला आगे बढती जा रही थी। मुझे अच्छे खासे पढे लिखे लोगो की जड बुद्वि पर तरस आता था कि बिना पढे कैसे किसी व्यक्ति के खिलाफ धारणा बनाई जा सकती हैं। ओशो को बदनाम करने में कई समाचार पत्र भी पीछे नहीं रहें। उनमें भी ऐसे आलेख प्रकाशित होते रहे जिससे दुष्प्रचार को हवा मिलती रही। कई आलेख तो ऐसे लेखको के होते थे जिन्होने न तो कभी पुस्तक पढी और न ही कोई प्रवचन सुना। कल्पना कीजिए कि ऐसे विषाक्त माहोले में हम ओशो के रंग में रंगने लगे थे। यह रंग किसी को रास नहीं आ रहा था। संयोग कहिए कि मै कॉलेज की परिक्षाओं में अच्छी प्रफोरमेंस देता तो अकारण पनपी विरोधियों की टीम ईर्ष्या के बोझ तले दबने लगी। उनके लिए यह कौतुहल का विषय हो गया था कि मैं पाठयक्रम के बाहर का इतना साहित्य पढता हूॅ फिर भी परिक्षाओं में अच्छे नंबरो से कैसे उतीर्ण हो जाता हूॅ। अब वरिष्ठ नागरिक होने के बाद मुझे मालूम हुआ कि ओशो की करुणा से ही यह संभव हो पाया। ओशो के इस सूत्र को आत्मसात करने से कि जो भी करो, होशपूर्वक करो, प्रगति की राह आसान होती गई। रास्ते स्वयं आगे का मार्ग दिखाने लगे। अस्तित्व सहयोग करने लगा। चित्त, शांत अवस्था की ओर कदम बढा रहा था। न किसी से प्रतियोगिता की होड रही। धीरे-धीरे, मैत्री ने पॉव पसारना शुरु किया तो दुर्भावना का विष तिरोहित होने लगा। प्रत्येक व्यक्ति में उस परम प्यारे की झलक नजर आने लगी। पेड पौधे भी प्रेममय दिखाई देनें लगे। चांद तारो का रसपान का स्वपन, मैत्री भाव से स्वतः ही साकार होने लगा। जो प्रभात नीरस लगता था, वही प्रभात अब उत्सव का पर्याय लगने लगा। ओशो की करुणा से जीवन में रुपानंतरण का सूर्योदय होने लगा।
खैर। लोगो के कटाक्ष और जीवन रुपानंतरण की प्रक्रिया समानांतर चलती रही। हम बात कर रहे थें, भाव-शुद्वि की। अशुद्व, भाव वे होते है जो भीतर से उत्पन्न न होकर बाहर की किसी घटना की प्रतिक्रिया होती हैं। ओशो ने चित्त की अवस्था को शुद्व भाव की संज्ञा दी हैं। चित्त की अवस्था से निकले भाव चित्त को शांति और सुकून देते हैं। इनसे अंतस के विकास का झरना खुलता हैं। शुद्व और अशुद भावो के पहचान की कसौटी यह हैं कि यदि कोई भाव हमारे भीतर से आता है तो वह शुद्व भाव होगा। यदि कोई भाव अन्य व्यक्ति की क्रिया या घटना से जन्म लेते हैं तो भाव अशुद्व होगें। अधिक मात्रा में इन भावो का आगमन हमारे भीतर बैचेनी, क्रोध और वैमनस्यता को पैदा कर सकते हैं। कोई व्यक्ति सवेरे की सैर में हमे विन्रमता से अभिवादन करे तो मन में प्रसन्नता का भाव उत्पन्न होता है। यह भाव शुद्व नहीं है। यह उस व्यक्ति के विनम्रतापूर्ण अभिवादन की प्रतिक्रिया है। इसके विपरित कोई व्यक्ति हमारे से मिलते समय कटु वचनो का प्रयोग करता है तो क्रोध के भाव उत्पन्न होते हैं। यह क्रोध के भाव कटु वचनो के श्रृवण से अस्तित्व में आए हैं। जो प्रतिक्रिया होने से अशुद्व भाव की श्रेणी में आएगें।
भावो के शुद्विकरण के श्रृखला में मैत्री की भूमिका सर्वाधिक मानी गई है। जीवन में मैत्री का आगमन स्वतः संभव नहीं है। मैत्री को निमत्रंण देना होगा। मैत्री केा जीवन का अंग बनाने के लिए साधना करनी होगी। जिस समाजिक जीवन के हम अंग है। वहॉ मैत्री का विकास स्वतः संभव नहीं है। ओशो कहते है कि सबके के भीतर मैत्री का केंद्र मौजूद हैं लेकिन जीवन की जटिल प्रक्रिया के कारण, यह केंद्र जीवन भर अविकसित रह सकता है। मैत्री और प्रेम को विकसित होने के लिए अभयपूर्ण भूमि की आवश्यकता होती है। जब तक भूमि में अभय के तत्व नही होगें, मैत्री और प्रेम का वृक्ष कभी भी पुष्पित और पल्लवित नही होगा। मैत्री की साधना के लिए प्रथम सोपान लोगो की निस्वार्थ सेवा हो सकती है। इस सोपान का विस्तार मानव मात्र तक सीमित नहीं होकर पशु-पक्षियो, और संपूर्ण कायनात के प्रति हैं। यदि किसी भी धर्म को मानने वाले व्यक्ति अंधेरे में कीट पंतंगो के प्रति स्वाभाविक रुप से हिंसा न करने के प्रयोजन से भोजन करने का निषेध करते है तो यह अंहिसा है। इस भावना का उदभव करुणा से हुआ हैं। एक दूसरा पहलू भी हैं। जहॉ किसी धर्म विशेष के अनुयायी अपने पुरखो के अनुसरण में अंधेरे में भोजन नहीं करते हैं वहॉ ओशो ने इसे आदत की संज्ञा देते हुए इस कृत्य को अंहिसा की श्रेणी में शुमार नहीं किया हैं।
समाज में लोगो को नाराज न करने के प्रयोजन से विनम्र शब्दावली का प्रयोग किया जाना शिष्टाचार का तकाजा हैं। यह विनम्रता सामाजिक व्यवस्था का अंग हो सकती है। इसे मैत्री नही माना जाना चाहिए। मैत्री तो साधना से ही आएगी। इस साधना का शुभारंभ प्रकुति के प्रति प्रेम भेजकर किया जा सकता हैं। ओशो का कहना हैं कि हमारे भीतर इतनी कटुता हैं कि हमें पृथ्वी के संपूर्ण मानव जगत के प्रति प्रेम संदेश भेजने में अडचन हो सकती है इसलिए नदी और पहाडो को प्रेम और मैत्री का संदेश भेजना सरल सुकर होगा। सूर्योदय के दर्शन, नदी को माता के समकक्ष मानना, चॉद को मामा के रिश्ते से संबोधित करना, प्रकुति के प्रति प्रेममय होने के ही प्रयोग थे। ओशो तो यहॉ तक कहते हैं कि यदि कोई चंद्रमा की चांदनी में कुछ क्षण मौन होकर बैठ जाए शरीर में प्रेम मैत्री का केंद्र विकसित होगा। चंद्रमा की चांदनी के प्रति अहोभाव प्रकट करने से प्रेम मैत्री के केद्र को विकसित होने में मदद मिल सकती है। महाबलेश्वर के शिविर में ओशो ने रहस्य उजागर किया कि हमारे चारो ओर अवसर ही अवसर है। यह प्रकृति अदभूत रहस्यो से लबालब हैं। प्रेम के अवसर को खाली नहीं जाने दे। जब भी प्रेम का अवसर उपलब्ध हो उसका उपयोग कर ले। जैसे आप रास्ते से जा रहे हैं। रास्ते में कोई पत्थर नजर आया। उस पत्थर को वहॉ से हटाकर ऐसे स्थान पर रख दे जहॉ किसी राहगीर को चोट लगने की संभाावना न रहें। यह अतिसरल साधना हैं। किसी राहगीर को पत्थर से होने वाले नुकसान से बचाकर हमने प्रेम का कृत्य संपंन कर दिया। रोजमर्रा के कृत्यो में लोगो से हाथ मिलाना एक सामान्य सी आदत हैं। इस आदत से भी मैत्री और प्रेम को साधा जा सकता हैं। स्वयं को प्रेम से लबरेज कर किसी के प्रति प्रेमपूर्ण होकर हाथ मिलाया जाए तो समझ लीजिए कि आप प्रेम के केंद्र को विकसित करने की दिशा में अग्रसर हो रहे है। ऐसा बार बार करने से इस केंद्र को विकसित किया जा सकता हैं। इतना ही ख्याल जहन में रखना हैं कि इन कृत्यो के परिणाम की हमारे भीतर कोई आंकाक्षा नहीं हैं। यह कृत्य तो हम भाव-शुद्वि के प्रथम चरण के लिए कर रहे है। जब यह भावना विकसित हो जाएगी कि हमारे कृत्य सामने वाले की प्रतिक्रिया से कोई संबंध नही रखते है तब इस केंद्र का विकास होगा। हमारे सभी कृत्य मात्र आनंद प्राप्ति के लिए हो जाए तो स्वर्ग पृथ्वी पर स्थापित होने में अधिक समय नहीं लगेगा। ओशो ने तो यहॉ तक दावा किया है कि ऐसी निरतंर साधना से आप उनके प्रति भी मैत्रीपूर्ण हो जाएगें, जिनके मन में आपके प्रति शत्रुता के बीज पडे हुए हैं। ऐसी स्थिति भी आ सकती हैं कि हम उदघोषित कर सके कि मेरी किसी से कोई शत्रुता नहीं है। सभी से मेरी मैत्री हैं। इसके बाद जीवन के आनंद को देखिए। झरने फूट पडेगें, आनंद, प्रेम और मैत्री के। मौसम की बारिश भी अहसास देगी कि प्रकृति अमृत बरसा रही हैं। सुबह की ओस सुखद अहसास देगी।
इस प्रकार हम अपने भावो की शुद्वि के उपाय कर सकते है। भावनाए तरंगित होकर दूसरे व्यक्ति तक पहुॅचती हैं। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव हैं। एक व्यक्ति के प्रति मेरे मन में कई कारणो से शत्रुता के भाव विकसित होते गए। हमारे बीच कोई मूलभूत विवाद नहीं था। बस समझ की कमी के कारण पहले तो संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न हुई फिर एक घटना के तंतु दूसरी घटना से संयोगवसात जुडते गए। शत्रुता चरम पर पहुॅच गई तो मुझे याद आया कि मैत्री और प्रेम इस शत्रुता के झझावात के वेग को कम कर सकते है। मै प्रत्येक रात्रि को छत पर चला जाता और उस व्यक्ति को प्रेम और मैत्री के संदेश भेजने लगा। धीरे-धीरे मन हल्का होना शुरु हो गया। मुझे ऐसा प्रतीत होनें लगा कि सिर से बोझ कम हो रहा हैं। यह प्रक्रिया पंद्रह दिन निरंतर चलती रही। तनाव का ग्राफ तो दिन-प्रतिदिन नीचे आ ही रहा था बल्कि एक चमत्कारिक घटना घटित हो गई। मेरे फोन पर उस व्यक्ति नें गुड मोनिंग का मैसेज भेजा। पहले तो मुझे यकीन नहीं हुआ कि यह मैसेज उसी शख्स का है। लेकिन आई0डी0 कॉलर ने सच्चाई की पुष्टि कर दी। तनाव का ग्राफ शून्य के स्तर पर आ गया। सोहलवें दिन की रात्रि को फिर मैने प्रेम और मैत्री का संदेश भेजा। सतरवें दिन फिर गुड मोर्निंग का मैसेज पढनें को मिला। एक संदेश भी लिखा था कि क्या हम आज शाम निखिल की शादी के फंक्शन में मिल सकते हैं? अब तो मेरा विश्वास यकीन में तब्दील हो गया। अब कोई शक सुबाह नहीं रह गया था कि यह सब मैत्री के संदेशो का ही परिणाम हैं। शाम को शादी के फंक्शन में एक ही टेबिल पर भोजन किया। कई मुददो पर खुलकर बात हुई। निष्कर्ष निकला की संवादहीनता से ऐसे हालात पैदा हुए। मैत्री के संदेशों की तंरगो ने उनके ह्रदय की वीणा को झंकृुत कर दिया।
ऐसे होता है, मैत्री संदेशो का परिणाम।
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